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Commonwealth Games 2026:पोलियो, ताने, सब्जी बेचने से कॉमनवेल्थ तक का सफर; जानिए क्यों बदला 'अविनाश' ने अपना नाम 'झंडू कुमार'

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Alam Ki Khabar: बिहार के गया निवासी पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में कांस्य पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया। जानिए उनके नाम बदलने, संघर्ष और सफलता की प्रेरक कहानी।

गया/नई दिल्ली। आलम की खबर: बिहार के गया जिले के पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में कांस्य पदक जीतकर देश और बिहार का नाम रोशन किया है। पुरुष हेवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग स्पर्धा में 190 किलोग्राम वजन उठाकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर शानदार प्रदर्शन किया। पदक जीतने के बाद उन्होंने अपने संघर्ष, नाम बदलने और सफलता तक के सफर की ऐसी कहानी सुनाई जिसने हर किसी को भावुक कर दिया।

झंडू कुमार ने बताया कि उनका बचपन का नाम अविनाश कुमार था। पांच वर्ष की उम्र में पोलियो होने के बाद उनके माता-पिता ने इलाज के लिए अपनी पूरी जमा-पूंजी खर्च कर दी। उस दौरान कई लोगों ने परिवार का मजाक उड़ाते हुए कहा कि बच्चे के इलाज में सब कुछ बर्बाद हो गया। यही ताने उनके जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गए।

उन्होंने बताया कि लोग उन्हें तंज कसते हुए 'झंडू' कहने लगे। शुरुआत में यह बात चुभती थी, लेकिन बाद में उन्होंने उसी नाम को अपनी पहचान बना लिया। एक समय उन्होंने दोबारा अपना नाम बदलने की भी कोशिश की, लेकिन सरकारी कार्यालय में जब कर्मचारियों ने उनका नाम सुनकर हंसना शुरू किया तो उन्होंने तय कर लिया कि अब यही नाम उनकी पहचान बनेगा।

कॉमनवेल्थ पदक विजेता ने कहा कि सफलता का यह सफर आसान नहीं था। आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने सब्जियां बेचीं, टोटो चलाया और छोटे-मोटे काम किए। परिवार की आमदनी सीमित होने के कारण जिम की फीस और पौष्टिक आहार जुटाना भी बड़ी चुनौती थी। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और परिवार, दोस्तों तथा भाई के सहयोग से अपना छोटा जिम तैयार किया।

झंडू कुमार ने बताया कि उन्हें बॉडीबिल्डिंग और फिटनेस की प्रेरणा बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान से मिली। उनकी फिल्मों में दिखाई गई फिटनेस को देखकर उन्होंने जिम जाने का सपना देखा। दिव्यांग होने के कारण शुरुआत में झिझक थी, लेकिन एक दोस्त के साथ जिम पहुंचे और वहीं से उनकी नई यात्रा शुरू हुई।

उन्होंने वर्ष 2018 में पैरा खेलों के बारे में जाना और पहले शॉटपुट में हाथ आजमाया। बाद में पैरा पावरलिफ्टिंग को अपना लक्ष्य बनाया। लगातार मेहनत का परिणाम यह रहा कि कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में उन्होंने 181 और फिर 190 किलोग्राम वजन सफलतापूर्वक उठाया। तीसरे प्रयास में 196 किलोग्राम का भार नहीं उठा सके, लेकिन कांस्य पदक अपने नाम करने में सफल रहे।

झंडू कुमार के पिता रामानंद पासवान ने बताया कि बेटे के इलाज के लिए परिवार ने हर संभव प्रयास किया। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद बेटे का हौसला कभी नहीं टूटा और आज उसकी मेहनत पूरे देश के लिए प्रेरणा बन गई है।

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विशेष टिप्पणी

झंडू कुमार की कहानी केवल एक खिलाड़ी की सफलता नहीं, बल्कि संघर्ष, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच की मिसाल है। जिन्होंने कभी उनके नाम और दिव्यांगता का मजाक उड़ाया, आज वही नाम पूरे देश में सम्मान के साथ लिया जा रहा है। यह उपलब्धि हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा है कि परिस्थितियां नहीं, बल्कि हौसला इंसान की पहचान बनाता है।

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